शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

जानिए भद्रा की शुभता-अशुभता

जानिए भद्रा की शुभता-अशुभता
पंचांग में भद्रा का महत्व

किसी भी मांगलिक कार्य में भद्रा योग का विशेष ध्यान रखा जाता है। क्योंकि भद्रा काल में मंगल-उत्सव की शुरुआत या समाप्ति अशुभ मानी जाती है। अत: भद्रा काल की अशुभता को मानकर कोई भी आस्थावान व्यक्ति शुभ कार्य नहीं करता। इसलिए जानते हैं कि आखिर क्या होती है भद्रा और क्यों इसे अशुभ माना जाता है?
पुराणों के अनुसार भद्रा भगवान सूर्य देव की पुत्री और राजा शनि की बहन है। शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी कड़क बताया गया है। उनके स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उन्हें कालगणना या पंचाग के एक प्रमुख अंग विष्टी करण में स्थान दिया। भद्रा की स्थिति में कुछ शुभ कार्यों, यात्रा और उत्पादन आदि कार्यों को निषेध माना गया। किंतु भद्रा काल में तंत्र कार्य, अदालती और राजनैतिक चुनाव कार्यों सुफल देने वाले माने गए हैं।
पंचांग में भद्रा का महत्व :-
हिन्दू पंचांग के पांच प्रमुख अंग होते हैं। यह है - तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण। इनमें करण एक महत्वपूर्ण अंग होता है। यह तिथि का आधा भाग होता है। करण की संख्या 11 होती है। यह चर और अचर में बांटे गए हैं। चर या गतिशील करण में बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि गिने जाते हैं। अचर या अचलित करण में शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न होते हैं। इन 11 करणों में सातवें करण विष्टि का नाम ही भद्रा है। यह सदैव गतिशील होती है। पंचाग शुद्धि में भद्रा का खास महत्व होता है।
यूं तो भद्रा का शाब्दिक अर्थ है कल्याण करने वाली लेकिन इस अर्थ के विपरीत भद्रा या विष्टी करण में शुभ कार्य निषेध बताए गए हैं। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार अलग-अलग राशियों के अनुसार भद्रा तीनों लोकों में घूमती है। जब यह मृत्युलोक में होती है, तब सभी शुभ कार्यों में बाधक या या उनका नाश करने वाली मानी गई है।
जब चंन्द्रमा, कर्क, सिंह, कुंभ व मीन राशि में विचरण करता है और भद्रा विष्टी करण का योग होता है, तब भद्रा पृथ्वीलोक में रहती है। इस समय सभी कार्य शुभ कार्य वर्जित होते है। इसके दोष निवारण के लिए भद्रा व्रत का विधान भी धर्मग्रंथों में बताया गया है।
भद्रा की उत्पत्ति

ऐसा माना जाता है कि दैत्यों को मारने के लिए भद्रा गर्दभ (गधा) के मुख और लंबे पुंछ और तीन पैर युक्त उत्पन्न हुई। पौराणिक कथा के अनुसार भद्रा भगवान सूर्य नारायण और पत्नी छाया की कन्या व शनि की बहन है।
भद्रा, काले वर्ण, लंबे केश, बड़े दांत वाली तथा भयंकर रूप वाली कन्या है। जन्म लेते ही भद्रा यज्ञों में विघ्न-बाधा पहुंचाने लगी और मंगल-कार्यों में उपद्रव करने लगी तथा सारे जगत को पीड़ा पहुंचाने लगी। उसके दुष्ट स्वभाव को देख कर सूर्य देव को उसके विवाह की चिंता होने लगी और वे सोचने लगे कि इस दुष्टा कुरूपा कन्या का विवाह कैसे होगा? सभी ने सूर्य देव के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब सूर्य देव ने ब्रह्मा जी से उचित परामर्श मांगा।
ब्रह्मा जी ने तब विष्टि से कहा कि -'भद्रे, बव, बालव, कौलव आदि करणों के अंत में तुम निवास करो तथा जो व्यक्ति तुम्हारे समय में गृह प्रवेश तथा अन्य मांगलिक कार्य करें,
तो तुम उन्ही में विघ्न डालो, जो तुम्हारा आदर न करे, उनका कार्य तुम बिगाड़ देना। इस प्रकार उपदेश देकर बृह्मा जी अपने लोक चले गए।
तब से भद्रा अपने समय में ही देव-दानव-मानव समस्त प्राणियों को कष्ट देती हुई घूमने लगी। इस प्रकार भद्रा की उत्पत्ति हुई।
भद्रा का दूसरा नाम विष्टि करण है। कृष्णपक्ष की तृतीया, दशमी और शुक्ल पक्ष की चर्तुथी, एकादशी के उत्तरार्ध में एवं कृष्णपक्ष की सप्तमी-चतुर्दशी, शुक्लपक्ष की अष्टमी-पूर्णमासी के पूर्वार्ध में भद्रा रहती है।
जिस भद्रा के समय चन्द्रमा मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक राशि में स्थित तो भद्रा निवास स्वर्ग में होता है । यदि चन्द्रमा कन्या, तुला, धनु, मकर राशि में हो तो भद्रा पाताल में निवास करती है और कर्क, सिंह, कुंभ, मीन राशि का चन्द्रमा हो तो भद्रा का भू-लोक पर निवास रहता है। शास्त्रों के अनुसार धरती लोक की भद्रा सबसे अधिक अशुभ मानी जाती है। तिथि के पूर्वार्ध की दिन की भद्रा कहलाती है। तिथि के उत्तरार्ध की भद्रा को रात की भद्रा कहते हैं। यदि दिन की भद्रा रात के समय और रात्रि की भद्रा दिन के समय आ जाए तो भद्रा को शुभ मानते हैं।
यदि भद्रा के समय कोई अति आवश्यक कार्य करना हो तो भद्रा की प्रारंभ की 5 घटी जो भद्रा का मुख होती है, अवश्य त्याग देना चाहिए।
भद्रा 5 घटी मुख में, 2 घटी कंठ में, 11 घटी ह्रदय में और 4 घटी पुच्छ में स्थित रहती है।
जानिए भद्रा के प्रमुख दोष :-
• जब भद्रा मुख में रहती है तो कार्य का नाश होता है।
• जब भद्रा कंठ में रहती है तो धन का नाश होता है।
• जब भद्रा हृदय में रहती है तो प्राण का नाश होता है।
• जब भद्रा पुच्छ में होती है, तो विजय की प्राप्ति एवं कार्य सिद्ध होते हैं।
भद्रा के दुष्प्रभावों से बचने का आसान उपाय है भद्रा के 12 नामों का जप करना-
धन्या दधमुखी भद्रा महामारी खरानना।
कालारात्रिर्महारुद्रा विष्टिश्च कुल पुत्रिका।
भैरवी च महाकाली असुराणां क्षयन्करी।
द्वादश्चैव तु नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्।
न च व्याधिर्भवैत तस्य रोगी रोगात्प्रमुच्यते।
गृह्यः सर्वेनुकूला: स्यर्नु च विघ्रादि जायते।

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

किस लड़की में क्या है खास बात अंक ज्योतिष के अनुसार

इस तरह आप खुद जान सकते हैं कि किस लड़की में क्या है खास बात

अंक ज्योतिष के अनुसार जिस लड़की की जन्मतिथि 1, 10, 19 या 28 होती है उनका मूलांक एक होता है। ऐसी लड़की काफी समझदारी एवं सामाजिक होती है। इनमें व्यवसायिक क्षमताएं होती हैं जिससे यह न सिर्फ घर को अच्छी तरह संभल सकती है बल्कि पति के काम में भी सहयोग करती है। इनमें आत्मसम्मान एवं आत्मगौरव भरा होता है। यह घर परिवार एवं समाज में अपनी पहचान बनाकर रखने विश्वास करती हैं।

जिन लड़कियों की जन्मतिथि 2, 11, 20 या 29 होती है उनका मूलांक 2 होता है। इस मूलांक वाली लड़कियां शांत एवं सौम्य स्वभाव की होती है। इनमें सजने संवरने और आकर्षक दिखने की जबरदस्त चाहत रहती है। इसका कारण है कि इनमें आकर्षण का केन्द्र बने रहने की तीव्र इच्छा होती है।

किसी भी महीने की 3, 12, 21 या 30 तारीख को जिनका जन्मदिन होता है वह मूलांक तीन से प्रभावित होती है। ऐसी लड़कियां मीठा बोलने वाली और परिवार में अधिक रुचि रखने वाली होती है। यह विवाह के बाद अपने पति पर पूरा प्रभाव बनाए रखती है। ऐसी स्त्रियां रोमांटिक भी खूब होती है और संगीत एवं कला में काफी रुचि रखती हैं। पति इनके नाम से व्यवसाय करें तो उन्हें कारोबार में अच्छी सफलता मिलती है।

जिन लड़कियों का जन्म किसी भी महीने के 4, 13, 22 या 31 तारीख को हुआ है वह मूलांक 4 की होती है। ऐसी स्त्रियों के बारे में अंक ज्योतिष कहता है कि इनका दिमाग तेज होता है और यह बुद्घिमान एवं पढ़ने लिखने में होशियार होती है। इन्हें बन संवरकर रहना बड़ा ही अच्छा लगता है। इन्हें घर से बाहर रहना अधिक पसंद होता है। यह खुले विचारों वाली होती है।

जिन लड़कियों का जन्मदिन 5, 15 या 23 तारीख होता है उनका मूलांक 5 होता है। ऐसी लड़कियों के बारे में अकंज्योतिष कहता है कि व्यवहार कुशल और सुलझे विचारों वाली होती हैं। यह जीवन में उन्नति और कामयाबी चाहने वाली होती है। विवाह के बाद यह अपने बच्चों एवं पति की उन्नति में अहम भूमिका निभाती हैं।

किसी भी महीने की 6, 15 या 24 तारीख को जिनका जन्म होता है वह स्त्री आमतौर पर रूपवती और आकर्षक होती है। इनका हृदय उदार और ममता से भरा होता है। इनमें परिवार चलाने की अच्छी योग्यता होती है इसलिए यह एक अच्छी मां और पत्नी बनती हैं। अपने व्यवहार एवं गुण के कारण यह समाज में प्रतिष्ठित होती हैं और परिवार में आदर पाती हैं।

जिनका मूलाक 7 होता है यानी जिनकी जन्मतिथि 7, 16 या 27 होती है उन्हें अकेले रहना अच्छा लगता है। इनकी चाहत होती है कि लोग इन पर ध्यान दें। शाद के बाद यह पति से विशेष स्नेह और अपनापन की चाहत रखती है। आर्थिक मामलों में इन्हें काफी संघर्ष करना पड़ता है।

जिन लड़कियों की जन्मतिथि 8, 17 या 26 तारीख होती है वह काफी लगनशील और मेहनती होती हैं। यह दिखावा करने की बजाय अपनी बुद्घि, लगन और प्रयास से जीवन में आगे बढ़ती है। यह एक अच्छी सलाहकार होती है और अपने परिवार को बेहतर तरीके से संभालती है।

जिन लड़कियों का जन्मदिन किसी भी महीने की 9, 18 या 27 तारीख होता है वह खुल विचारों की और मनमौजी होती है। इन्हें गुस्सा भी खूब आता है इसलिए इनके साथ जरा कायदे से ही पेश आना चाहिए। यह रोमांटिक होती हैं और जमाने के साथ चलना पसंद करती हैं।

स्त्री हो या पुरुष, नाम अक्षर से जाने प्रेम प्रसंग

स्त्री हो या पुरुष, नाम अक्षर से जाने प्रेम प्रसंग
सभी 12 राशियों का स्वभाव अलग-अलग होता है
और इन राशियों के कारण संबंधित लोगों का स्वभाव और भविष्य बनता है। राशि स्वभाव के आधार पर ही हमारे रिश्ते, मित्रता, प्रेम-प्रसंग निर्भर होते हैं। यदि आप जानना चाहते हैं कि आपका प्रेम प्रसंग किस स्त्री या पुरुष के साथ कैसा रहेगा तो यहां अपने नाम अक्षर के अनुसार जानिए...
राशि अनुसार नाम अक्षर
आपके नाम का पहला अक्षर किस राशि के अंर्तगत आता है
और अन्य राशि के नाम अक्षर...
मेष- चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ.
वृष- ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो
मिथुन- का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, ह
कर्क- ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो
सिंह- मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे
कन्या- ढो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो
तुला- रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते
वृश्चिक- तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू
धनु- ये, यो, भा, भी, भू, धा, फा, ढा, भे
मकर- भो, जा, जी, खी, खू, खे, खो, गा, गी
कुंभ- गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा
मीन- दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची

मेष राशि: जिन लोगों की राशि मेष है, उन लोगों की
लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है। मेष राशि के लोगों के लिए कुंभ, तुला या मिथुन राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है। वृष, कन्या या मकर राशि के लोगों के साथ मेष राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी। मेष राशि के लोगों के लिए वृश्चिक, मीन या कर्क राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।

वृष राशि: वृष राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है। यदि किसी व्यक्ति की राशि वृष है और वह कर्क, वृश्चिक या मीन राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी। जिन लोगों की राशि वृष है, उनके लिए मेष, सिंह या धनु राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं। वृष राशि के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।

मिथुन राशि: मिथुन राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला
या कुंभ राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग
उत्तम रहता है। यदि किसी व्यक्ति की राशि मिथुन है और वह मेष, धनु या सिंह राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी। जिन लोगों की राशि मिथुन है, उनके लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं।
मिथुन राशि के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथ
जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।

कर्क राशि: जिन लोगों की राशि कर्क है, उन लोगों की
लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं।
इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है। कर्क राशि के लोगों के
लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है। मिथुन, तुला या कुंभ राशि के लोगों के साथ कर्क राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है।
इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी।
कर्क राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के
साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।

सिंह राशि: सिंह राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु
राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है। यदि किसी व्यक्ति की राशि सिंह है और वह मिथुन,तुला या कुंभ राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी। जिन लोगों की राशि सिंह है,
उनके लिए वृष, कन्या या मकर राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं। सिंह राशि के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथ
जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।

कन्या राशि: जिन लोगों की राशि कन्या है, उन लोगों
की लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है। कन्या राशि के लोगों के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है। मेष, सिंह और धनु राशि के लोगों के साथ कन्या राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है।
इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी। कर्क राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।

तुला राशि: तुला राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या
कुंभ राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम
रहता है। यदि किसी व्यक्ति की राशि तुला है और वह मेष,सिंह या धनु राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह
जोड़ी सामान्य रहेगी। जिन लोगों की राशि तुला है,
उनके लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं। तुला राशि के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।

वृश्चिक राशि: जिन लोगों की राशि वृश्चिक है, उन
लोगों की लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी
श्रेष्ठ रहते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
वृश्चिक राशि के लोगों के लिए वृष, कन्या या मकर राशि
के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।
मिथुन, तुला या कुंभ राशि के लोगों के साथ कन्या राशि
का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी। वृश्चिक राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।

धनु राशि: धनु राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु
राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है। यदि किसी व्यक्ति की राशि धनु है और वह मिथुन, तुला या कुंभ राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह जोड़ी सामान्य रहेगी। जिन लोगों की राशि धनु है, उनके लिए वृष, कन्या या मकर राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं। धनु राशि के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।

मकर राशि: जिन लोगों की राशि मकर है, उन लोगों की
लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं।
इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है।
मकर राशि के लोगों के लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि
के साथी सामान्य रहते है। इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।
मेष, सिंह या धनु राशि के लोगों के साथ मकर राशि का
प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी। मकर राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या कुंभ राशि के साथी
उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।

कुंभ राशि: कुंभ राशि के लोगों के लिए मिथुन, तुला या
कुंभ राशि के साथी श्रेष्ठ होते हैं। इनका प्रेम प्रसंग उत्तम
रहता है। यदि किसी व्यक्ति की राशि कुंभ है और वह मेष,सिंह या धनु राशि का साथी चुनना चाहता है तो यह
जोड़ी सामान्य रहेगी। जिन लोगों की राशि कुंभ है, उनके लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के व्यक्ति के साथ प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 होती हैं। कुंभ राशि के लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथ जोड़ी बनना श्रेष्ठ नहीं माना गया है।

मीन राशि: जिन लोगों की राशि मीन है, उन लोगों की
लिए कर्क, वृश्चिक या मीन राशि के साथी श्रेष्ठ रहते हैं।
इनका प्रेम प्रसंग उत्तम रहता है। मीन राशि के लोगों के
लिए वृष, कन्या या मकर राशि के साथी सामान्य रहते है।इनका प्रेम प्रसंग आपसी तालमेल पर अधिक निर्भर रहता है।मिथुन, तुला और कुंभ राशि के लोगों के साथ मीन राशि का प्रेम प्रसंग सफल होने की संभावनाएं 50-50 रहती है। इन्हें सफलता भी मिल सकती है और असफलता भी। मीन राशि के लोगों के लिए मेष, सिंह या धनु राशि के साथी उत्तम नहीं माने गए हैं। इनके प्रेम प्रसंग की सफलता की संभावनाएं बहुत कम होती हैं।

गंडमूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले

गंडमूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले

अशुभ नहीं भाग्यशाली होते हैं मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले
ज्योतिषशास्त्र में गंडमूल नक्षत्र के अंतर्गत अश्विनी, रेवती, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र को रखा गया है। ज्योतिषियों का मानना है कि अगर बच्चे का जन्म गंडमूल नक्षत्र में हो तब एक महीने के अंदर जब भी वही नक्षत्र लौटकर आए तो उस दिन गंडमूल नक्षत्र की शांति करा लेनी चाहिए अन्यथा इसका अशुभ परिणाम प्राप्त होता है।
लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय ब्राह्मण नामक ग्रंथ में बताया गया है कि कुछ स्थितियों में यह दोष अपने आप समाप्त हो जाता है। और इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले व्यक्ति खुद के लिए भाग्यशाली होता है।
व्यक्ति का जन्म अगर वृष, सिंह, वृश्चिक अथवा कुंभ लग्न में हो तब मूल नक्षत्र में जन्म होने पर भी इसका अशुभ फल प्राप्त नहीं होता है। गण्डमूल नक्षत्र में जन्म लेने पर भी अगर लड़के का जन्म रात में और लड़की का जन्म दिन में हो तब मूल नक्षत्र का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
गण्डमूल नक्षत्र मघा के चौथे चरण में जन्म लेने वाला बच्चा धनवान और भाग्यशाली होता है।
गण्डमूल का प्रभाव
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं। बच्चे का जन्म अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में, रेवती नक्षत्र के चौथे चरण में, अश्लेषा के चौथे चरण में, मघा एवं मूल के पहले चरण में एवं ज्येष्ठा के चौथे चरण में हुआ है तब मूल नक्षत्र हानिकारक होता है। बच्चे का जन्म अगर मंगलवार अथवा शनिवार के दिन हुआ है तो इसके अशुभ प्रभाव और बढ़ जाते हैं।

ग्रहों के नाम मित्र शत्रु

ग्रहों के नाम मित्र शत्रु सम

ग्रहों के नाम 
1. सूर्य :-
मित्र- चन्द्र, मंगल, गुरू
शत्रु - शुक्र शनि,  राहु, केतू
सम -   बुध
2 .चन्द्र : -
मित्र - सूर्य, बुध
शत्रु - राहु, केतू
सम - मंगल, गुरू , शुक्र,  शनि,
3. मंगल :-
मित्र - सूर्य  ,चन्द्र, गुरू
शत्रु - बुध , केतू
सम - शुक्र,  शनि,  राहु
4. बुध :-
मित्र - सूर्य  , शुक्र,
शत्रु - चन्द्र, राहु,
सम - मंगल, गुरू , शनि,  केतू
5. गुरू  :-
मित्र - सूर्य  ,चन्द्र, मंगल,
शत्रु - बुध, शुक्र,
सम - शनि,  राहु, केतू
6. शुक्र  :-
मित्र - बुध,  शनि, केतू
शत्रु - सूर्य  ,चन्द्र,   राहु,
सम - मंगल, गुरू ,
7. शनि  :-
मित्र - बुध , शुक्र ,  राहु
शत्रु - सूर्य  ,चन्द्र, मंगल,  केत
सम -  गुरू , केतू
8 . राहु  :-
मित्र -बुध, शनि, 
शत्रु - सूर्य  ,चन्द्र, मंगल,
सम - गुरू ,केतू
9 . केतू  :-
मित्र - शुक्र,  राहु,
शत्रु - चन्द्र, मंगल,
सम - सूर्य  , बुध, गुरू , शनि, 

राशियों की जाति ,तत्व, दिशा, प्राकृतिकस्वभाव

राशियों के स्वभाव इस प्रकार हैं-

मेष – पुरुष जाति, चरसंज्ञक,अग्नि तत्व, पूर्व दिशा की मालिक, मस्तक का बोध कराने वाली, पृष्ठोदय, उग्र प्रकृति, लाल-पीले वर्ण वाली,कान्तिहीन, क्षत्रियवर्ण, सभी समान अंग वाली औरअल्पसन्तति है। यह पित्त प्रकृतिकारक है। इसका प्राकृतिकस्वभाव साहसी, अभिमानी और मित्रों पर कृपा रखने वाला है।

वृष – स्त्री राशि, स्थिरसंज्ञक, भूमितत्व, शीतल स्वभाव,
कान्ति रहित, दक्षिण दिशा की स्वामिनी, वातप्रकृति,
रात्रिबली, चार चरण वाली, श्वेत वर्ण, महाशब्दकारी,
विषमोदयी, मध्य सन्तति, शुभकारक, वैश्य वर्ण और शिथिल
शरीर है। यह अर्द्धजल राशि कहलाती है। इसका प्राकृतिक
स्वभाव स्वार्थी, समझ-बूझकर काम करने वाली और सांसारिक कार्यों में दक्ष होती है। इससे कण्ठ, मुख और
कपोलों का विचार किया जाता है।

मिथुन – पश्चिम दिशा की स्वामिनी, वायुतत्व, तोते के
समान हरित वर्ण वाली, पुरुष राशि, द्विस्वभाव, विषमोदयी,
उष्ण, शूद्रवर्ण, महाशब्दकारी, चिकनी, दिनबली, मध्य
सन्तति और शिथिल शरीर है। इसका प्राकृतिक स्वभाव
विद्याध्ययनी और शिल्पी है। इससे हाथ, शरीर के कंधों और
बाहुओं का विचार किया जाता है।

कर्क – चर, स्त्री जाति, सौम्य और कफ प्रकृति, जलचारी,
समोदयी, रात्रिबली, उत्तर दिशा की स्वामिनी, रक्त-धवल
मिश्रित वर्ण, बहुचरण एवं संतान वाली है। इसका प्राकृतिक
स्वभाव सांसारिक उन्नति में प्रयत्नशीलता, लज्जा, और
कार्यस्थैर्य है। इससे पेट, वक्षःस्थल और गुर्दे का विचार
किया जाता है।

सिंह – पुरुष जाति, स्थिरसंज्ञक, अग्नितत्व, दिनबली, पित्त
प्रकृति, पीत वर्ण, उष्ण स्वभाव, पूर्व दिशा की स्वामिनी,
पुष्ट शरीर, क्षत्रिय वर्ण, अल्पसन्तति, भ्रमणप्रिय और निर्जल
राशि है। इसका प्राकृतिक स्वरूप मेष राशि जैसा है, पर
तो भी इसमें स्वातन्त्र्य प्रेम और उदारता विशेष रूप से विद्यमान है। इससे हृदय का विचार किया जाता है।

कन्या – पिंगल वर्ण, स्त्रीजाति, द्विस्वभाव, दक्षिण
दिशा की स्वामिनी, रात्रिबली, वायु और शीत प्रकृति,
पृथ्वीतत्व और अल्पसन्तान वाली है। इसका प्राकृतिक स्वभाव मिथुन जैसा है, पर विशेषता इतनी है कि अपनी उन्नति और मान पर पूर्ण ध्यान रखने की यह कोशिश करती है। इससे पेट का विचार किया जाता है।

तुला – पुरुष जाति, चरसंज्ञक, वायुतत्व, पश्चिम
दिशा की स्वामिनी, अल्पसंतान वाली, श्यामवर्ण
शीर्षोदयी, शूद्रसंज्ञक, दिनबली, क्रूर स्वभाव और पाद जल
राशि है। इसका प्राकृतिक स्वभाव विचारशील, ज्ञानप्रिय,
कार्य-सम्पादक और राजनीतिज्ञ है। इससे नाभि के नीचे के
अंगों का विचार किया जाता है।

वृश्चिक – स्थिरसंज्ञक,
शुभ्रवर्ण, स्त्रीजाति, जलतत्व, उत्तर दिशा की स्वामिनी,
रात्रिबली, कफ प्रकृति, बहुसन्तति, ब्राह्मण वर्ण और अर्द्ध जल
राशि है। इसका प्राकृतिक स्वभाव दम्भी, हठी, दृढ़प्रतिज्ञ,
स्पष्टवादी और निर्मल है। इससे शरीर के क़द और
जननेन्द्रियों का विचार किया जाता है।

धनु – पुरुष जाति,
कांचन वर्ण, द्विस्वभाव, क्रूरसंज्ञक, पित्त प्रकृति, दिनबली,
पूर्व दिशा की स्वामिनी, दृढ़ शरीर, अग्नि तत्व, क्षत्रिय वर्ण,
अल्पसन्तति और अर्द्ध जल राशि है। इसका प्राकृतिक स्वभाव अधिकारप्रिय, करुणामय और मर्यादा का इच्छुक है। इससे पैरों की सन्धि और जंघाओं का विचार किया जाता है।

मकर –चरसंज्ञक, स्त्री जाति, पृथ्वीतत्व, वात प्रकृति, पिंगल वर्ण,रात्रिबली, वैश्यवर्ण, शिथिल शरीर और दक्षिण
दिशा की स्वामिनी है। इसका प्राकृतिक स्वभाव उच्च
दशाभिलाषी है। इससे घुटनों का विचार किया जाता है।

कुम्भ– पुरुष जाति                                             स्थिरसंज्ञक, वायु तत्व, विचित्र वर्ण, शीर्षोदय,अर्द्धजल, त्रिदोष प्रकृति, दिनबली, पश्चिम दिशा की स्वामिनी, उष्ण स्वभाव, शूद्र वर्ण, क्रूर एवं मध्य संतान वाली है। इसका प्राकृतिक स्वभाव विचारशील,शान्तचित्त, धर्मवीर और नवीन बातों का आविष्कारक है।इससे पेट की भीतरी भागों का विचार किया जाता है।

मीन –द्विस्वभाव, स्त्री जाति, कफ प्रकृति, जलतत्व, रात्रिबली,विप्रवर्ण, उत्तरदिशा की स्वामिनी और पिंगल वर्ण है।

इसका प्राकृतिक स्वभाव उत्तम, दयालु और दानशील है। यह
सम्पूर्ण जलराशि है। इससे पैरों का विचार किया जाता है।