सोमवार, 25 अगस्त 2025

भाव से विचार

प्रथम भाव : प्रथम भाव से विचारणीय विषय हैं - जन्म, सिर, शरीर, अंग, आयु, रंग-रूप, कद, जाति आदि।

द्वितीय भाव: दूसरे भाव से विचारणीय विषय हैं - रुपया पैसा, धन, नेत्र, मुख, वाणी, आर्थिक स्थिति, कुटुंब, भोजन, जिह्य, दांत, मृत्यु, नाक आदि।

तृतीय भाव : तृतीय भाव के अंतर्गत आने वाले विषय हैं - स्वयं से छोटे सहोदर, साहस, डर, कान, शक्ति, मानसिक संतुलन आदि।

चतुर्थ भाव : इस भाव के अंतर्गत प्रमुख विषय - सुख, विद्या, वाहन, ह्दय, संपत्ति, गृह, माता, संबंधी गण,पशुधन और इमारतें।

पंचव भाव : पंचम भाव के विचारणीय विषय हैं - संतान, संतान सुख, बुद्धि कुशाग्रता, प्रशंसा योग्य कार्य, दान, मनोरंजन, जुआ आदि।

षष्ठ भाव : इस भाव से विचारणीय विषय हैं - रोग, शारीरिक वक्रता, शत्रु कष्ट, चिंता, चोट, मुकदमेबाजी, मामा, अवसाद आदि।

सप्तम भाव : विवाह, पत्नी, यौन सुख, यात्रा, मृत्यु, पार्टनर आदि विचारणीय विषय सप्तम भाव से संबंधित हैं।
अष्टम भाव : आयु, दुर्भाग्य, पापकर्म, कर्ज, शत्रुता, अकाल मृत्यु, कठिनाइयां, सन्ताप और पिछले जन्म के कर्मों के मुताबिक सुख व दुख, परलोक गमन आदि विचारणीय विषय आठवें भाव से संबंधित हैं।

नवम भाव : इस भाव से विचारणीय विषय हैं - पिता, भाग्य, गुरु, प्रशंसा, योग्य कार्य, धर्म, दानशीलता, पूर्वजन्मों का संचि पुण्य।

दशम भाव : दशम भाव से विचारणीय विषय हैं - उदरपालन, व्यवसाय, व्यापार, प्रतिष्ठा, श्रेणी, पद, प्रसिद्धि, अधिकार, प्रभुत्व, पैतृक व्यवसाय।

एकादश भाव : इस भाव से विचारणीय विषय हैं - लाभ, ज्येष्ठ भ्राता, मुनाफा, आभूषण, अभिलाषा पूर्ति, धन संपत्ति की प्राप्ति, व्यापार में लाभ आदि।

द्वादश भाव : इस भाव से संबंधित विचारणीय विषय हैं - व्यय, यातना, मोक्ष, दरिद्रता, शत्रुता के कार्य, दान, चोरी से हानि, बंधन, चोरों से संबंध, बायीं आंख, शय्यासुख, पैर आदि।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

राशियों के जातक विवाह

मेष और कुम्भ: यदि इन दोनों राशियों के जातक विवाह करते हैं संबंध बेहतर होता है। क्योंकि ये लोग साहसी, बंधन मुक्त और घूमना पसंद करते हैं।

वृश्चिक और सिंह: सिंह राशि को लोग अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना पसंद करते हैं तो वृश्चिक राशि के लोग थोड़े तेज प्रवृत्ति के होते हैं इसलिए ऐसे में दोनों राशियों के जातकों को विवाह करने से बचना चाहिए।

मेष और कर्क: जैसा कि पहले बताया गया है मेष राशि के लोग साहसी, निर्भीक होते है, कर्क राशि के लोग इन्हें पसंद करते हैं। इस लिए विवाह के लिए इन दोनों राशियों का सामंजस्य बेहतर माना जाता है।

तुला और सिंह: तुला और सिंह दोनों राशियों के जातक ही सामाजिक होना पसंद करते हैं, यह उन दोनों की खासियत है जो उन्हें एक दूसरे के बिलकुल काबिल बनाती है।

कर्क और मीन: इनमे दोनों राशियों के जातक में किसी भी तरह का छल कपट नहीं होता है एक दूसरे के लिए। दोनों बहुत भावात्मक और बुद्धिमान होते हैं। इसलिए ये बेहतर हैं।

धनु और मेष: ये व्यक्ति समाज से बहुत प्रेम करने वाले होते हैं यही खूबी मेष के अन्दर होती है जो उन दोनों को एक दुसरे के लिए बिलकुल सही जोड़ी बनाती है।

मिथुन और तुला: इन दोनों का यौन सम्बन्ध बहुत अच्छा होता है, जो इनके वैवाहिक सम्बन्ध खुशनुमा बनाता है। इसलिए ये बेहतर हैं।

मेष और मीन: मीन राशि वाले व्यक्ति सामान्य रूप से जिम्मेदारियों से बचते है और अपना काम अपने मेष साथी को देने से बुरा नहीं मानते हैं।

सिंह और मिथुन: मिथुन राशि वालों के पास यह क्षमता होती है कि वह सिंह राशि के व्यक्ति को बहकने से रोक सके और उसे गलत रास्ते पर जाने से बचा लेते हैं।

कुम्भ और मिथुन: कुम्भ राशि वाले बहुत ही रचनात्मक होते हैं जिसे मिथुन राशि वाले बहुत पसंद करते हैं।

पढ़ें: यदि पत्नी गुस्सा करती है, तो शास्त्रों में हैं ये अचूक उपाय

कन्या और मकर: मकर वाले बहुत ही व्यावहारिक होते हैं और कन्या की इमानदारी से बहुत प्रभावित रहते हैं।

सिंह और धनु:धनु राशी के लोग सिंह राशि वालों के आत्मविश्वास बहुत पसंद आता है, जबकि कुछ और दूसरे चीजों के मामले में ये थोड़े कठोर होते हैं।

मकर और वृषभ: मकर राशि वालों को उनके वृषभ साथी का दयालु और संवेदनशील स्वभाव बहुत पसंद आता है।करता है।


रविवार, 23 अक्टूबर 2016

ऐसे करें श्राद्ध

जब सूर्य की छाया पैरों पर पडऩे लगे तभी श्राद्ध करना चाहिए।
सुबह-सुबह या 12 बजे से पहले किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता।
पूर्वजों की पूजा हमेशा दाएं कंधे में जनेऊ डालकर और दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके ही करनी चाहिए।
एक दिन, तीन दिन, सात दिन, पंद्रह दिन और 17 दिन का कर्मकांड किया जाता है।
मृत्युतिथि पर ही श्राद्ध किया जाता है। इस दिन ब्राम्हण भोजन का भी विधान है।
श्राद्ध में गंगाजल, दूध, शहद, तरस का कपड़ा, दौहित्र, कुश और तिल का उपयोग होता है।
तुलसी से से भी तर्पण किया जाता है। यह विष्णु जी को अर्पित की जाती
श्राद्ध सोने, चांदी कांसे, तांबे के पात्र से या पत्तल के प्रयोग से करना चाहिए।<
लोहे के आसन का उपयोग नहीं करना चाहिए।
श्राद्ध पक्ष में मांगलिक कार्य पूर्ण रूप से वर्जित हैं।
जौ और चावल का उपयोग तर्पण के लिए श्रेष्ठ है। इसमें काली तिल का भी उपयोग किया जाता है।
श्राद्ध के दिन काओ को भोग के रूप में भोजन करवाने की परम्परा को अपनी आवाज से काओ को बुलाया जाता हैं |

पितरों को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच तर्पण किया। जौ का आटा, खोवा, चावल, बालू आदि पदार्थों के साथ पिंदडदान करके पूजा अर्चना की गई।

तर्पण करते समय पीतल की थाली या बर्तन में साफ जल भरकर उसमें थोड़े सा काला तिल व दूध डालकर अपने सामने रख लें और अपने सामने एक दूसरा खाली बर्तन रख लें। दोनों हाथों को एकसाथ मिलाकर उस मृत व्यक्ति का नाम लेकर तृप्यन्ताम कहते हुये अंजली में भरे हुये जल को दूसरे खाली पात्र में छोड़ दें।

जल में काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद फूल मिलकार उस जल से विधिपूर्वक तर्पण किया जाता है इससे पितर तृप्त होते हैं। इसके बाद श्राद्ध के बाद ब्राह्मण को भोजन कराकर यथाशक्ति दान दिया जाता है।

रविवार, 25 सितंबर 2016

धार्मिक कार्य में मौली क्यों बांधते हैं?

धार्मिक कार्य में मौली क्यों बांधते हैं?

येन बद्धो बलीराजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल माचल।।
मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, ‍जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं।

मौली का अर्थ : ' मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।

मौली बांधने का मंत्र :

‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’
कैसी होती है मौली? : मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव।
कहां-कहां बांधते हैं मौली? : मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है। इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता है।

मौली बांधने के नियम :

*शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।
*कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।
*मौली कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए।

कब बांधी जाती है मौली? :

*पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।
*हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।
*प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।

क्यों बांधते हैं मौली? :

* मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है।
* किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।
* किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।
* मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक।
* किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।
* हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।
* इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।

मौली करती है रक्षा : मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।
इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता।

आध्यात्मिक पक्ष :

*शास्त्रों का ऐसा मत है कि मौली बांधने से त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों- लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति, विष्णु की कृपा से रक्षा तथा शिव की कृपा से दुर्गुणों का नाश होता है। इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है।
*यह मौली किसी देवी या देवता के नाम पर भी बांधी जाती है जिससे संकटों और विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा होती है। यह मंदिरों में मन्नत के लिए भी बांधी जाती है।
*इसमें संकल्प निहित होता है। मौली बांधकर किए गए संकल्प का उल्लंघन करना अनुचित और संकट में डालने वाला सिद्ध हो सकता है। यदि आपने किसी देवी या देवता के नाम की यह मौली बांधी है तो उसकी पवित्रता का ध्यान रखना भी जरूरी हो जाता है।
*कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।

चिकित्सीय पक्ष : प्राचीनकाल से ही कलाई, पैर, कमर और गले में भी मौली बांधे जाने की परंपरा के ‍ लाभ भी हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार इससे त्रिदोष अर्थात वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। पुराने वैद्य और घर-परिवार के बुजुर्ग लोग हाथ, कमर, गले व पैर के अंगूठे में मौली का उपयोग करते थे, जो शरीर के लिए लाभकारी था। ब्लड प्रेशर, हार्टअटैक, डायबिटीज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिए मौली बांधना हितकर बताया गया है।
हाथ में बांधे जाने का लाभ : शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है अतः यहां मौली बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। उसकी ऊर्जा का ज्यादा क्षय नहीं होता है। शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है।
कमर पर बांधी गई मौली : कमर पर बांधी गई मौली के संबंध में विद्वान लोग कहते हैं कि इससे सूक्ष्म शरीर स्थिर रहता है और कोई दूसरी बुरी आत्मा आपके शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती है। बच्चों को अक्सर कमर में मौली बांधी जाती है। यह काला धागा भी होता है। इससे पेट में किसी भी प्रकार के रोग नहीं होते।
मनोवैज्ञानिक लाभ : मौली बांधने से उसके पवित्र और शक्तिशाली बंधन होने का अहसास होता रहता है और इससे मन में शांति और पवित्रता बनी रहती है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में बुरे विचार नहीं आते और वह गलत रास्तों पर नहीं भटकता है। कई मौकों पर इससे व्यक्ति गलत कार्य करने से बच जाता है।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

धूप से पाएँ जीवन में शांति

धूप से पाएँ जीवन में शांति

... गन्धाक्षतम्, पुष्पाणि, धूपम्, दीपम्, नैवेद्यम् समर्पयामि।'

धूप, दीप, चंदन, कुमकुम, अष्टगंध, जल, अगर, कर्पूर, घृत, गुड़, घी, पुष्प, फल, पंचामृत, पंचगव्य, नैवेद्य, हवन, शंख, घंटा, रंगोली, माँडना, आँगन-अलंकरण, तुलसी, तिलक, मौली (कलाई पर बाँधे जाने वाला नाड़ा), स्वस्तिक, ओम, पीपल, आम और कैले के पत्तों का हिंदू धर्म में बहुत महत्व है। भोजन करने के पूर्व कुछ मात्रा में भोजन को अग्नि को समर्पित करने से वैश्वदेव यज्ञ पूर्ण होता है।
तंत्रसार के अनुसार अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागरमाथा, चंदन, इलाइची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गुल ये सोलह प्रकार के धूप माने गए हैं। इसे षोडशांग धूप कहते हैं। मदरत्न के अनुसार चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे दशांग धूप कहते हैं।
इसके अलावा भी अन्य मिश्रणों का भी उल्लेख मिलता है जैसे- छह भाग कुष्ठ, दो भाग गुड़, तीन भाग लाक्षा, पाँचवाँ भाग नखला, हरीतकी, राल समान अंश में, दपै एक भाग, शिलाजय तीन लव जिनता, नागरमोथा चार भाग, गुग्गुल एक भाग लेने से अति उत्तम धूप तैयार होती है। रुहिकाख्य, कण, दारुसिहृक, अगर, सित, शंख, जातीफल, श्रीश ये धूप में श्रेष्ठ माने जाते हैं।
यहाँ प्रस्तुत है सामान्य तौर पर गुड़ और घी से दी जाने वाली धूप के महत्व के बारे में संक्षिप्त जानकारी ।
कैसे दें धूप : हिंदू धर्म में धूप देने और दीप जलाने का बहुत ज्यादा महत्व है। सामान्य तौर पर धूप दो तरह से ही दी जाती है। पहला गुग्गुल- कर्पूर से और दूसरा गुड़-घी मिलाकर जलते कंडे पर उसे रखा जाता है। यहाँ गुड़ और घी से दी गई धूप का खास महत्व है।

सर्वप्रथम एक कंडा जलाएँ। फिर कुछ देर बाद जब उसके अंगारे ही रह जाएँ तब गुड़ और घी बराबर मात्रा में लेकर उक्त अंगारे पर रख दें और उसके आस-पास अँगुली से जल अर्पण करें। अँगुली से देवताओं को और अँगूठे से अर्पण करने से वह धूप पितरों को लगती है। जब देवताओं के लिए करें तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश का ध्यान करें और जब पितरों के लिए अर्पण करें तब अर्यमा सहित अपने पितरों का ध्यान करें और उनसे सुख-शांति की कामना करें।
धूप देने के नियम : रोज धूप नहीं दे पाएँ तो तेरस, चौदस, और अमावस्या, चौदस तथा पूर्णिमा को सुबह-शाम धूप अवश्य देना चाहिए। सुबह दी जाने वाली धूप देवगणों के लिए और शाम को दी जाने वाली धूप पितरों के लिए।
धूप देने के पूर्व घर की सफाई कर दें। पवित्र होकर-रहकर ही धूप दें। धूप ईशान कोण में ही दें। घर के सभी कमरों में धूप की सुगंध फैल जाना चाहिए। धूप देने और धूप का असर रहे तब तक किसी भी प्रकार का संगीत नहीं बजाना चाहिए। हो सके तो कम से कम बात करना चाहिए।

लाभ : धूप देने से मन, शरीर और घर में शांति की स्थापना होती है। रोग और शोक मिट जाते हैं। गृहकलह और आकस्मिक घटना-दुर्घटना नहीं होती। घर के भीतर व्याप्त सभी तरह की नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकलकर घर का वास्तुदोष मिट जाता है। ग्रह-नक्षत्रों से होने वाले छिटपुट बुरे असर भी धूप देने से दूर हो जाते हैं। श्राद्धपक्ष में 16 दिन ही दी जाने वाली धूप से पितृ तृप्त होकर मुक्त हो जाते हैं तथा पितृदोष का समाधान होकर पितृयज्ञ भी पूर्ण होता है।

बुधवार, 21 सितंबर 2016

गुरु चांडाल योग

गुरु चांडाल योग

देवगुरु बृहस्पति राहु के साथ नीच राशि मकर में युति बनाकर बैठे हैं। गुरु-राहु की युति को चांडाल योग के नाम से जाना जाता है। सामान्यत: यह योग अच्छा नहीं माना जाता। जिस भाव में फलीभूत होता है, उस भाव के शुभ फलों की कमी करता है। यदि मूल जन्म कुंडली में गुरु लग्न, पंचम, सप्तम, नवम या दशम भाव का स्वामी होकर चांडाल योग बनाता हो तो ऐसे व्यक्तियों को जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है। जीवन में कई बार गलत निर्णयों से नुकसान उठाना पड़ता है। पद-प्रतिष्ठा को भी धक्का लगने की आशंका रहती है।
वास्तव में गुरु ज्ञान का ग्रह है, बुद्धि का दाता है। जब यह नीच का हो जाता है तो ज्ञान में कमी लाता है। बुद्धि को क्षीण बना देता है। राहु छाया ग्रह है जो भ्रम, संदेह, शक, चालबाजी का कारक है। नीच का गुरु अपनी शुभता को खो देता है। उस पर राहु की युति इसे और भी निर्बल बनाती है। राहु मकर राशि में मित्र का ही माना जाता है (शनिवत राहु) अत: यह बुद्धि भ्रष्ट करता है। निरंतर भ्रम-संदेह की स्थिति बनाए रखता है तथा गलत निर्णयों की ओर अग्रसर करता है।
यदि मूल कुंडली या गोचर कुंडली इस योग के प्रभाव में हो तो निम्न उपाय कारगर सिद्ध हो सकते हैं-
1. योग्य गुरु की शरण में जाएँ, उसकी सेवा करें और आशीर्वाद प्राप्त करें। स्वयं हल्दी और केसर का टीका लगाएँ।
2. निर्धन विद्यार्थियों को अध्ययन में सहायता करें।
3. निर्णय लेते समय बड़ों की राय लें।
4. वाणी पर नियंत्रण रखें। व्यवहार में सामाजिकता लाएँ।
5. खुलकर हँसे, प्रसन्न रहें।
6. गणेशजी और देवी सरस्वती की उपासना और मंत्र जाप करें।
7. बरगद के वृक्ष में कच्चा दूध डालें, केले का पूजन करें, गाय की सेवा करें।
8. राहु का जप-दान करें।

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

वैवाहिक जीवन में मंगल की इस स्थिति का परिणाम

वैवाहिक जीवन में मंगल की इस स्थिति का परिणाम

ज्योतिषशास्त्र में मंगल को क्रूर और पाप ग्रह बताया गया है। कुंडली में मंगल की विशेष स्थिति से ही मांगलिक दोष बनता है तो वैवाहिक जीवन से जुड़ी कई परेशानियों का कारण होता है। इसलिए ज्योतिषी विवाह के लिए कुण्डली मिलाते समय मंगल की स्थिति को जरूर देखते हैं। ज्योतिषशास्त्र में यह भी बताया गया है कि मंगल की विशेष स्थिति से विवाह के बाद स्त्री पुरुष को यौन सुख में भी कमी का सामना करना पड़ता है। तो आइये देखें कुण्डली में मंगल की कैसी स्थिति होने पर यौन सुख में कमी आती है।
इस तस्वीर में देखिए मंगल कुण्डली के पहले घर में बैठा है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मंगल पहले घर में होने पर व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में चोट एवं दुर्घटना की आशंका अधिक रहती है। यह मंगल पारिवारिक जीवन के साथ ही साथ जीवनसाथी एवं यौन सुख में कमी लाता है। मंगल की दृष्टि पहले घर से आठवें घर पर होने के कारण जीवनसाथी की आयु भी प्रभावित होती है।
जिनकी कुण्डली में मंगल चौथे घर में बैठा होता है उनके जीवन में सुख की कमी करता है। सातवें घर में मंगल की दृष्टि से इनकी शादी में देरी होती है। जीवनसाथी से मतभेद एवं यौन सुख में कमी लाता है। ऐसे व्यक्ति यौन रोग से पीड़ित भी हो सकते हैं। इन्हें नौकरी एवं व्यवसाय में नुकसान उठाना पड़ता है। आय एवं लाभ में बार-बार बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
जिनकी जन्मपत्री में मंगल सातवें यानी जीवनसाथी के घर में होता है उनका अपने जीवनसाथी से अक्सर मतभेद बना रहता है और जिससे दांपत्य जीवन के सुख में कमी आती है। मंगल की दृष्टि यहां से पहले घर पर होने के कारण व्यक्ति क्रोधी होता है और स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव के कारण परेशान होता है। सगे-संबंधियों से सहयोग में कमी एवं आर्थिक नुकसान भी इन्हें उठाना पड़ता है।
तस्वीर में देखिए यहां मंगल आठवें घर में बैठा है। जिनकी कुण्डली में मंगल इस घर में बैठा होता है उन्हें जोखिम से बचना चहिए क्योंकि दुर्घटना की संभावना अधिक रहती है। जीवनसाथी के स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव बने रहने के कारण इनके दांपत्य जीवन में परेशानी आती है। जीवनसाथी के साथ तालमेल में भी इन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सगे-संबंधियों से मनमुटाव एवं आर्थिक नुकसान भी इन्हें उठाना पड़ता है।
मंगल अगर कुण्डली में 12 वें घर में बैठा होता है तो शादी देर से होती है। व्यक्ति अपने परिवार और जीवनसाथी से अधिकतर दूर ही रहता है। यह अपने वैवाहिक जीवन में यौन सुख की कमी महसूस करते हैं। इन्हें दुर्घटना एवं धोखा मिलने की भी आशांका बनी रहती है। किसी न किसी कारण से यह पूरी नींद नहीं ले पाते हैं।
वैवाहिक जीवन में मंगल की इस स्थिति का परिणाम उन हालातों में अधिक देखने को मिलता है जब वर और कन्या दोनों में से केवल एक ही मांगलिक दोष से प्रभावित होते हैं। जहां पर वर या कन्या की कुण्डली में मंगल बैठा हो उसी घर में अगर कोई दूसरा पाप ग्रह जैसे शनि, राहु या केतु बैठा हो तब इस दोष का प्रभाव कम हो जाता है। कुण्डली में ग्रहों की कुछ अन्य स्थितियां भी मंगल के इस अशुभ प्रभाव को कम करती हैं।

मंगली लोगों का विवाह मंगली लोगों से, जानिए……..

क्यों करते हैं मंगली लोगों का विवाह मंगली लोगों से,

जानिए……..

क्या आप जानते हैं कि मंगली शब्द किन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है। किन कारणों से कोई स्त्री या पुरुष मंगली होते हैं। मंगली होने के क्या-क्या प्रभाव होते हैं?
यदि आप इन प्रश्नों के उत्तर नहीं जानते हैं तो यहां जानिए

मंगली शब्द से जुड़ी खास बातें…
ज्योतिष के अनुसार मंगली लोगों पर मंगल ग्रह की विशेष मेहरबानी होने से व्यक्ति मालामाल हो जाता है। जो लोग मंगली होते हैं वे अपनी धर्मपत्नी से कुछ विशेष इच्छाएं रखते हैं,जो कि कोई मंगली जीवन साथी ही पूरी कर सकता है।

इसी वजह से मंगली लोगों का विवाह मंगली लोगों से
ही किया जाता है।

मंगली लोग उच्च पद, व्यवसायी, अभिभाषक, राजनीतिज्ञ, डॉक्टर, इंजीनियर आदि सभी क्षेत्रों में विशेष योग्यता प्राप्त करते हैं। विपरित लिंग के प्रति विशेष संवेदनशील रहते हैं। मंगल से प्रभाव से मंगली लोगों की कामुकता अधिक होती है और

इसी वजह से ये लोग अपने जीवन साथी में कुछ विशेष आशा रखते हैं। इसी कारण मंगली कुंडली वालों का विवाह मंगली से ही किया जाता है।

ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रह बताए गए हैं जो कुंडली में अलग-अलग स्थिति के अनुसार हमारा जीवन निर्धारित करते हैं। हमें जो भी सुख-दुख, खुशियां और सफलताएं या असफलताएं प्राप्त होती हैं वह सभी ग्रहों की स्थिति के अनुसार मिलती है। इन

नौ ग्रहों का सेनापति है मंगल ग्रह। मंगल ग्रह से ही संबंधित होते है मंगल दोष। मंगल दोष ही व्यक्ति को मंगली बनाता है।

कुंडली में कई प्रकार के दोष होते हैं। इन्हीं दोषों में से एक है मंगल दोष। यह दोष जिस व्यक्ति की कुंडली में होता है वह मंगली कहलाता है। जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के 1, 4,

7, 8, 12 वें स्थान या भाव में मंगल स्थित हो तो वह
व्यक्ति मंगली होता है।
मंगल के प्रभाव के कारण ऐसे लोग क्रोधी होते हैं। ज्योतिष के अनुसार मंगली व्यक्ति की शादी मंगली से ही होनी चाहिए।

भूमि-भवन से संबंधित कार्य करने वालों को मंगल ग्रह की विशेष कृपा की आवश्यकता है। मंगल देव की कृपा के बिना कोई व्यक्ति भी भूमि संबंधी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। मंगल से प्रभावित व्यक्ति अपनी धुन के पक्के होते हैं और किसी भी कार्य को बहुत अच्छे से करते है।

मंगल के शांति के उपाय भगवान शिव की स्तुति करें। मूंगे को धारण करें और गेहूं, मसूर की दाल, तांबा, सोना, लाल फूल,लाल वस्त्र, लाल चंदन, केशर, कस्तुरी, लाल बैल,भूमि आदि का दान करे!