रविवार, 23 अक्टूबर 2016

ऐसे करें श्राद्ध

जब सूर्य की छाया पैरों पर पडऩे लगे तभी श्राद्ध करना चाहिए।
सुबह-सुबह या 12 बजे से पहले किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता।
पूर्वजों की पूजा हमेशा दाएं कंधे में जनेऊ डालकर और दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके ही करनी चाहिए।
एक दिन, तीन दिन, सात दिन, पंद्रह दिन और 17 दिन का कर्मकांड किया जाता है।
मृत्युतिथि पर ही श्राद्ध किया जाता है। इस दिन ब्राम्हण भोजन का भी विधान है।
श्राद्ध में गंगाजल, दूध, शहद, तरस का कपड़ा, दौहित्र, कुश और तिल का उपयोग होता है।
तुलसी से से भी तर्पण किया जाता है। यह विष्णु जी को अर्पित की जाती
श्राद्ध सोने, चांदी कांसे, तांबे के पात्र से या पत्तल के प्रयोग से करना चाहिए।<
लोहे के आसन का उपयोग नहीं करना चाहिए।
श्राद्ध पक्ष में मांगलिक कार्य पूर्ण रूप से वर्जित हैं।
जौ और चावल का उपयोग तर्पण के लिए श्रेष्ठ है। इसमें काली तिल का भी उपयोग किया जाता है।
श्राद्ध के दिन काओ को भोग के रूप में भोजन करवाने की परम्परा को अपनी आवाज से काओ को बुलाया जाता हैं |

पितरों को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच तर्पण किया। जौ का आटा, खोवा, चावल, बालू आदि पदार्थों के साथ पिंदडदान करके पूजा अर्चना की गई।

तर्पण करते समय पीतल की थाली या बर्तन में साफ जल भरकर उसमें थोड़े सा काला तिल व दूध डालकर अपने सामने रख लें और अपने सामने एक दूसरा खाली बर्तन रख लें। दोनों हाथों को एकसाथ मिलाकर उस मृत व्यक्ति का नाम लेकर तृप्यन्ताम कहते हुये अंजली में भरे हुये जल को दूसरे खाली पात्र में छोड़ दें।

जल में काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद फूल मिलकार उस जल से विधिपूर्वक तर्पण किया जाता है इससे पितर तृप्त होते हैं। इसके बाद श्राद्ध के बाद ब्राह्मण को भोजन कराकर यथाशक्ति दान दिया जाता है।

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